पिता - पुत्र में अनबन एवं वास्तु दोष

घरो में पिता- पुत्र के बीच में अनबन बढ़ना  परिवार के लिए अच्छा नही होता।  आधुनिक समय में लोग वास्तु के नियमों की अवहेलना करके घर का निर्माण करते हैं और घर की साज-सज्जा भी इस प्रकार करते हैं जिससे वास्तु दोष उत्पन्न होता है और पिता - पुत्र में तनाव बड़ जाता  है. आइये  जानते है क्या वास्तु  दोष होता है इसके पीछे 










वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार सूर्य पिता का कारक ग्रह होता है सूर्योदय की दिशा पूरब होती है जिस घर में पूर्व दिशा दोषपूर्ण होती है उस घर में पिता और पुत्र के संबंध में दूरियां आती हैं।



जो प्लॉट  उत्तर व दक्षिण में संकरा तथा पूर्व व पश्चिम में लंबा हो तो ऐसे भवन को सूर्यभेदी कहते हैं। ऐसे भवन में पिता-पुत्र साथ रहें तो एक दूसरे से अक्सर विवाद होते रहते हैं और रिश्तों में दूरियां बढ़ जाती हैं।


पूरब दिशा में बड़े-बड़े वृक्ष, ऊंची दीवार एवं कटी हुई जमीन हो तो पूर्व दिशा दोषपूर्ण हो जाती है।


पिता पुत्र के मधुर संबंध के लिए उत्तर पूर्व दिशा यानी ईशान कोण में शौचालय अथवा रसोई घर नहीं होना चाहिए। यह पिता एवं पुत्र दोनों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। 


ईशान कोण को घर के अन्य भागों से ऊंचा नहीं रखना चाहिए साथ ही इस भाग में भारी सामान रखने से बचना चाहिए।



उत्तर पूर्वी भागों में इलेक्ट्रिक उपकरण रखने से पुत्र और पिता के स्वभाव में उग्रता आ जाती है जिससे कलह की सम्भावना बड़ जाती है


ईशान कोण में कूड़ादान रखते हों तो इससे पिता और पुत्र के बीच वैमनस्य बढ़ता है और गंभीर विवाद हो सकता है। 



वास्तु सम्बन्धी किसी सलाह के लिए कमेंट बॉक्स में लिखें 

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